मानवाअधिकार संरक्षण वर्तमान संदर्भ में
Dr. Smt. V. Sengupta
सहायक प्राध्यापक (समाजशा- ठा-छे-ला-शा-स्ना-महाविद्यालय]जांजगीर]
जिला जांजगीर-चाम्पा (छ-ग-
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
सारांश
प्रस्तुत शोधपत्र मानव अधिकार के संरक्षण पर आधारित है। वर्तमान में शिक्षित/अशिक्षित नागरिकों को मानव अधिकारों के बारे में जागरूक करके उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है। 20वीं सदी के उतरार्द्ध में विश्व में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक ही नही सांस्कृतिक परिवर्तनों की एक नवीन प्रक्रिया प्रारंभ हुर्ह है। परन्तु बढ़ती बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण और सामाजिक, आर्थिक अन्याय कि स्थिति सामाजिक विज्ञानों के परम्परागत सिद्धान्तों पर आघात कर रही है। नवीन तकनीक पूॅजी और संचार क्रांति के प्रभाव से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या समाज व्यवस्था और राज्य व्यवस्था सहित मानवीन संबंधो का पुर्ननिर्धारण हो रहा है ? क्या यह पुर्ननिर्धारण मानवीय है ? जैसे प्रश्नों के हल हमें खोजने होगें। वर्तमान परिस्थितियों में सामाजिक विज्ञानों का दायित्व बढ़ता जा रहा है।
उद्देश्य:-
1. मानवाधिकार की रक्षा करना।
2. विशेषकर ग्रामीण इलाकों में मानवाधिकारों के संबंध में जागरूकता लाना।
3. अशिक्षित/विशेषकर महिलाओं को मानवाधिकार के संबध्ंा मे विशेष रूप से जागृत करना।
उपकल्पना:-
1. मानवाधिकार का उपयोग सभी वर्ग के मानवों के लिए है।
2. सभी नागरिकों के मानवाधिकार सुरक्षित है।
अध्ययन क्षेत्र:-
जिला जांजगीर-चाम्पा के संबंध में।
अध्ययन पद्धति:-
प्रस्तुत शोधपत्र को द्वैतियक सामग्रियों का सहयोग लेकर तैयार किया गया है। मानव अधिकार से अभिप्राय ‘‘मौलिक’’ अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है। जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, नागरिक और राजनीतिक अधिकार सम्मिलित है जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक,
सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारो के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार, काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार है।
भारत में मानवाधिकार:-
देश में विशाल आकार और विविधता, विकासशील तथा संप्रभुता संपन्न, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतंत्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा, तथा एक भूतपूर्व औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप भारत में मानवाधिकारों की परिस्थिति एक प्रकार से जटिल हो गई है। भारत का संविधान मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता भी हैं। संविधान की धाराओं में बोलने की आजादी के साथ साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका का विभाजन तथा देश के अन्दर एवं बाहर जाने की भी आजादी दी गई है।
यह अक्सर मान लिया जाता है, विशेषकर मानवाधिकार दलों और कार्यकत्र्ताओं के द्ववारा कि दलित अथवा अछूत जाति के सदस्य पीड़ित हुए है। एवं लगातार पर्याप्त भेदभाव झेलते रहे है। हालांकि मानवाधिकार की समस्याएॅ भारत में मौजूद है। फिर भी इस देश के दक्षिण एशिया के दूसरे देशों की तरह आमतौर पर मानवाधिकारों को लेकर चिन्ता का विषय माना जाता है। 1. इन विचारों के आधार पर, फ्रीडम हाउस द्ववारा फ्रीडम इन द वल्र्ड 2006 को दिए गए रिपोर्ट में भारत को राजनीतिक अधिकारों के दर्जा, 2. एवं नागरिकों के अधिकारों के लिए दर्जा 3 दिया गया है, जिससे इसने स्वाधीन की संभतः उच्चतम दर्जा (रेटिंग) अर्जित की है।
भारत में मानवाधिकारों से संबंधित घटनाएॅ निम्नलिखित है:-
ऽ 1829 - पति की मृत्यु के बाद रूढ़िवादी हिन्दू दाह संस्कार के समय उसकी विधवा के आत्म दाह की चली आ रही सती-प्रथा को राजाराम मोहन राय ब्राम्हण समाज जैसे हिन्दू, सुधारवादी आंदोलनों के वर्षो प्रचार के पश्चाद् गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया।
ऽ 1929 - बाल विवाह निषेध अधिनियम में 14 साल से कम उम्र के नाबालिकों के विवाह पर निषेधाज्ञा पारित कर दी गई।
ऽ 1947 - भारत में ब्रिटिश राज से राजनीतिक आजादी हासिल की।
ऽ 1950 - भारत के संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार हासिल की।
ऽ संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की, संविधान के खण्ड 3 में उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्ववारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकारों का विधेयक अन्तर्भुक्त है। यह शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से पूर्ववर्ती वंचित वर्गो के लिए आरक्षण का प्रावधान भी करता है।
ऽ 1952 - अपराधिक जनजाति अधिनियम को पूर्ववर्ती ‘‘आपराधिक जनजातियों को ‘‘अनधिसूचित’’ के रूप में सरकार द्वारा वर्गीकृत किया गया तथा आभ्यासिक अपराधियों का अधिनियम (1952) पारित हुआ।
ऽ 1955 - हिन्दुओं से संबंधित परिवार के कानून में सुधार ने हिन्दू महिलाओं को अधिक अधिकार प्रदान किए।
ऽ 1958 - सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 19़58।
ऽ 1973 - भारत का उच्चतम न्यायालय केशवानन्द भारती के मामले में यह कानून लागू करता है कि संविधान की मौलिक संरचना (कई मौलिक अधिकारों सहित संवैधानिक संशोधन के द्वारा अपरिवर्तनीय है।)
ऽ 1975-77 - भारत मे ंआपात काल की स्थिति-अधिकारों के व्यापक उल्लंघन की घटनाएॅ घटी।
ऽ 1978 - मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में उच्च्तम न्यायालय ने यह कानून लागू किया कि आपात स्थिति में भी अनुच्छेद 21 के तहत् जीवन (जीने) के अधिकार को निलंबित नही किया जा सकता।
ऽ 1978 - जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 ।
ऽ { {1984 आपरेशन ब्लू स्टाॅर और उसके तत्काल बाद 1984 के सिक्ख विरोधी दंगे
ऽ 1985-6 शाहबानो मामला जिसमें उच्चतम न्यायालय ने तलाक-शुदा मुस्लिम महिला के अधिकार को मान्यता प्रदान की जिसने मौलानाआंे में विरोध की चिंगारी भड़का दी, उच्चतम न्यायालय के फैसले को अमान्य करार करने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया।
ऽ 1989 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पारित किया गया।
ऽ 1989 वर्तमान-कश्मीरी बगावत ने कश्मीरी पंडितों का नस्ली तौर पर सफाया, हिन्दू मंदिरों को नष्ट भष्ट्र कर देना, हिन्दुओं और सिखों की हत्या तथा विदेशी पर्यटको और सरकारी कार्यकत्र्तांओं का अपहरण देखा.
ऽ 1992-सवैंविधानिक संशोधन ने स्थानीय स्व-शासन (पंचायती राज) की स्थापना तीसरे तले (दर्जे) के शासन के ग्रामीण स्तर पर की गई जिसमें महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित की गई। साथ ही साथ अनुसूचित जातियों के लिए प्रावधान किए गए।
ऽ 1929 - हिन्दू-जनसूमह द्वारा बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दिया गया, परिणामस्वरूप देश भर में दंगे हुए.
ऽ 1993 - मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई।
ऽ 2001 - उच्चतम न्यायालय ने भोजन का अधिकार लागू करने के लिए व्यापक आदेश जारी किए.
ऽ 2002- गुजरात में हिंसा, मुख्य रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यक को लक्ष्य कर, कई लोगों की जानें गई.
ऽ 2005 - एक सशक्त सूचना का अधिकार अधिनियम पारित हुआ ताकि सार्वजनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में संघटित सूचना तक नागरिक की पहुॅच हो सकें.
ऽ 2005- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआईजीए) रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी प्रदान करता है।
ऽ 2006- उच्चतम न्यायालय भारतीय पुलिस के अपर्याप्त मानवाधिकारों के प्रतिक्रिया स्वरूप पुलिस सुधार के आदेश जारी किए।
ऽ 2006- दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की घोषणा की जिसने अनिर्दिष्ट ‘‘अप्राकृतिक’’ यौनाचरणों के सिलसिले को ही गैरकानूनी करार दिया, लेकिन जब यह व्यक्तिगत तौर पर दो लोगों के बीच सहमति के साथ समलैगिंक यौनाचरण के मामले में लागू किया गया तो संवैधानिक हो गया, तथा भारत में इसने समलैंगिक संपर्क को प्रभावी तरीके से अलग-अलग भेदभाव कर देखना शुरू किया। भारत में समलैंगिकता भी देखें।
निष्कर्षः-
प्रत्येक मानव का कर्तव्य बनता है कि मानवाधिकार का संरक्षण करना अनिवार्य है।
संदर्भ सूचीः-
1. इंटरनेट संचार माध्यम्।
2. योजना, 10 मई, 2010 पेज नं. 03.
3. कुरूक्षेत्र, 03 जून 2013, पेज नं. 10.
4. पाठक राममूर्ति, भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक रूपरेखा, अभिमन्यु, प्रकाशन, इलाहाबाद द्वितीय संस्करण, 2000।
5. सक्सेना, डाॅ. लक्ष्मी, समकालीन भारतीय दर्शन उ.प्र., हिन्दी संस्थान (ग्रंथ अकादमी प्रमाण) लखनऊ 1983।
Received on 01.11.2016 Modified on 20.11.2016
Accepted on 27.12.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 243-245